ह़म्द व नअ़्त और तक़रीर की आमदनी*26
*ह़म्द व नअ़्त और तक़रीर की आमदनी*
*जिसे दुर्रे मुख़्तार में फ़रमाया:*
माल जमअ़् करने के लिए वअ़्ज़ (बयान, तक़रीर) कहना यहूद व नस़ारा (यहूदियों और ई़साइयों) की गुमराहियों में से है।
येह तीसरी स़ूरत बैन बैन (दरमियानी, बीच में) है और दोवम (दूसरी) से ब-निस्बत ऊला (पहली) के क़रीब तर है।
जिस त़रह़ ह़ज को जाए और तिजारत का कुछ माल भी साथ ले जाए जिसे ”لَیۡسَ عَلَیۡکُمْ جُنَاحٌ اَنۡ تَبْتَغُوۡا فَضْلًا مِّنۡ رَّبِّکُمْؕ“ (तुम पर कुछ गुनाह नहीं कि तुम अपने परवर दिगार का फ़ज़्ल यअ़्नी रिज़्क़े ह़लाल तलाश करो) फ़रमाया। लिहाज़ा फ़तवा इस के जवाज़ (जाइज़) पर है।
📚फ़तावा रज़विय्यह, जिल्द²³ पेज³⁸¹,³⁸²
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*🏁 MASLAKE AALA HAZRAT 🔴*
*इमामे अहले सुन्नत फ़रमाते हैं:*
इस में तीन स़ूरतें हैं: ❶ अगर वअ़्ज़ कहने और ह़म्द व नअ़्त पढ़ने से मक़स़ूद यही है कि लोगों से कुछ माल ह़ास़िल करें तो बेशक इस आयते करीमह के तह़त में दाख़िल हैं और ह़ुक्म “وَلَا تَشْتَرُوۡا بِاٰیٰتِیۡ ثَمَنًا قَلِیۡلًا” (मेरी आयतों के बदले थोड़े दाम न वस़ूल करो - सूरतुल बक़रह, आयत⁴¹) के मुख़ालिफ़ - वोह आमदनी उन के ह़क़ में ख़बीस (नापाक) है ख़ुस़ूस़न जब्कि ऐसे ह़ाजत मन्द न हों जिन को सुवाल (मांगने) की इजाज़त है कि अब तो बे ज़रूरत सुवाल (मांगना) दूसरा ह़राम होगा और वोह आमदनी ख़बीस तर व ह़राम मिस्ले ग़स़ब (नाजाइज़ क़ब्ज़े की त़रह़) है,
*📚 फ़तावा आ़लमगीरी में है:* साइल (मांगने वाले ने) कद्दो काविश (कोशिश, भाग दौड़) से जो कुछ जमअ़् किया वोह नापाक है।
❷ दूसरे येह कि वअ़्ज़, ह़म्द व नअ़्त से उनका मक़स़ूद मह़ज़ अल्लाह है और मुसलमान बत़ौरे ख़ुद उनकी ख़िदमत करें तो येह जाइज़ है और वोह माल ह़लाल,
❸ तीसरे येह कि वअ़्ज़ से मक़स़ूद तो अल्लाह ही हो मगर बे ह़ाजत मन्द और आ़दतन मअ़्लूम है कि लोग ख़िदमत करेंगे इस ख़िदमत की त़मअ़् (लालच, ख़्वाहिश) भी साथ लगी हुई है तो अगरचे येह स़ूरत दोवम के मिस्ल (दूसरी स़ूरत की त़रह़) मह़मूद (क़ाबिले तअ़्रीफ़) नहीं मगर स़ूरे ऊला (पहली स़ूरत) की त़रह़ मज़मूम (बुरी) भी नहीं
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